एक छोटे से मोहल्ले में, एक लड़का अर्जुन रहता था। वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से था, और उसे दिल्ली में नौकरी के लिए एक किराये का घर चाहिए था। उसे एक छोटी सी कॉलोनी में एक प्यारा सा फ्लैट मिला, जिसका किराया थोड़ा ज्यादा था।
इस फ्लैट की मालिकिन, बिनीता दीदी, एक सुंदर और समझदार महिला थीं। बिनीता दीदी के बारे में अर्जुन ने सुना था कि वह बहुत सख्त और अनुशासनप्रिय हैं, लेकिन अर्जुन ने कभी उनसे व्यक्तिगत रूप से बात नहीं की थी।
जब वह पहली बार फ्लैट देखने गए, तो बिनीता दीदी ने उन्हें अपने घर के नियमों के बारे में बताया।
बिनीता दीदी की मुस्कान में कुछ ऐसा था, जो अर्जुन को अपनी ओर खींचता था, लेकिन वह खुद को संभालते हुए सिर्फ किराए के बारे में ही सोचते रहे।
समय के साथ, अर्जुन और बिनीता दीदी के बीच एक दोस्ताना रिश्ता बन गया। वे अक्सर एक-दूसरे से बातें करते, और अर्जुन को महसूस होने लगा कि बिनीता दीदी सिर्फ घर कीमा लकिन नहीं, बल्कि एक सजीव और समझदार इंसान भी हैं।
एक दिन, जब अर्जुन ऑफिस से थका हुआ वापस आया, तो बिनीता दीदी ने उसे चाय ऑफर की। बातचीत करते-करते,बिनीता ने कहा, "तुम यहां अकेले रहते हो, कभी-कभी घर की चुप्पी बहुत बेचैन करती है न अर्जुन ने जवाब दिया, "हां, मगर अब तो इस चुप्पी में आपकी आवाज़ भी आ जाती है।" वह पल कुछ ऐसा था,
जिसमें दोनों ने एक-दूसरे के दिलों में हल्की सी जगह बनाई थी। धीरे-धीरे उनका रिश्ता और भीगहरा होने लगा। एक दिन अर्जुनने बिनीता से कहा, "मुझे तो घर चाहिए था, दिल नहीं। लेकिन अब मुझे लगता है कि दिल ही वह घर है, जो मुझे सबसे ज़्यादा चाहिए था।
बिनीता दीदी मुस्कुरा दीं और कहने लगीं, "मैं भी यही सोच रही थी। कभी-कभी हमें वही मिलता है, जिसकी हमें सबसे कम उम्मीद होती है।"
और फिर, अर्जुन और बिनीता के बीच सिर्फ एक किराएदार और मालिकिन का रिश्ता नहीं, बल्कि एक सच्चे प्यार का रिश्ता बन गया।


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